जाने होलिका दहन की अमर कहानी

 होली का त्योहार प्रेम और सद्भावना से जुडा़ त्योहार है, जिसमें अध्यात्म का अनोखा रूप झलकता है। इस त्योहार को रंग और गुलाल के साथ मानने की परम्परा है। इस त्योहार के साथ कई पौराणिक कथाएं एवं मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।



हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपता तिथि को होली का पर्व मनाया जाता है. इससे एक गिन पहले होलिका दहन होता है. इस साल होली 29 मार्च और होलिका दहन 28 मार्च को है ! हर साल लोग होलिका दहन मनाते हैं इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं होलिका दहन (Holika Dahan) मनाने के पीछे क्या कारण है ! आज हम आपको होलिका दहन से संबंधित पौराणिक कहानी बताने जा रहे हैं !


होली की पूर्व संध्या में होलिका दहन किया जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है कि असुर हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था। इसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर स्वयं को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में केवल उसी की पूजा की जाएगी। उसने अपने राज्य में यज्ञ और आहुति बंद करवा दी और भगवान के भक्तों को सताना शुरू कर दिया। 

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख कहने के बावजूद प्रह्लाद विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की भी कई बार कोशिश की परंतु भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। असुर राजा की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। होलिका उस चादर को ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। 

 

दैवयोग से वह चादर उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गई, जिससे प्रह्लाद की जान बच गई और होलिका जल गई। होलिका दहन के दिन होली जलाकर होलिका नामक दुर्भावना का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का जश्न मनाया जाता है !

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